| सूरा-ए-तीन | ||
| 95 | अज़ीम और दाएमी (हमेशा बाक़ी रहने वाली) रहमतों वाले ख़ुदा के नाम से शुरू। | |
| 95 | 1 | क़सम है इंजीर और जै़तून की |
| 95 | 2 | और तूरे सिनीन की |
| 95 | 3 | और उस अमन वाले शहर की |
| 95 | 4 | हमने इन्सान को बेहतरीन (सबसे अच्छी) साख़्त मंे पैदा किया है |
| 95 | 5 | फिर हमने उसको पस्ततरीन (सबसे कमज़ोर, गिरी हुई) हालत की तरफ़ पलटा दिया है |
| 95 | 6 | अलावा उन लोगों के जो ईमान लाये और उन्होंने नेक (अच्छा) आमाल (कामं) अंजाम दिये तो उनके लिए न ख़त्म होने वाला अज्र (सिला) है |
| 95 | 7 | फिर तुमको रोज़े जज़ा (सिला) के बारे में कौन झुठला सकता है |
| 95 | 8 | क्या ख़ुदा सबसे बड़ा हाकिम और फ़ैसला करने वाला नहीं है |
Saturday, 18 April 2015
Sura-e-Teen 95th surah of Quran Urdu Translation of Quran in Hindi (Allama zeeshan haider Jawadi sb.)
Sura-e-Alsharah 94th surah of Quran Urdu Translation of Quran in Hindi (Allama zeeshan haider Jawadi sb.)
| सूरा-ए-अलशराह | ||
| 94 | अज़ीम और दाएमी (हमेशा बाक़ी रहने वाली) रहमतों वाले ख़ुदा के नाम से शुरू। | |
| 94 | 1 | क्या हमने आपके सीने को कुशादा नहीं किया |
| 94 | 2 | और क्या आपके बोझ को उतार नहीं लिया |
| 94 | 3 | जिसने आपकी कमर को तोड़ दिया था |
| 94 | 4 | और आपके जि़क्र को बलन्द कर दिया |
| 94 | 5 | हाँ ज़हमत (परेशानी) के साथ आसानी भी है |
| 94 | 6 | बेशक तकलीफ़ के साथ सहूलियत भी है |
| 94 | 7 | लेहाज़ा (इसलिये) जब आप फ़ारिग़ हो जायें तो नस्ब कर दें |
| 94 | 8 | और अपने रब की तरफ़ रूख़ करें |
Sura-e-Al-Zuha 93rd surah of Quran Urdu Translation of Quran in Hindi (Allama zeeshan haider Jawadi sb.)
| सूरा-ए-अलजुहा | ||
| 93 | अज़ीम और दाएमी (हमेशा बाक़ी रहने वाली) रहमतों वाले ख़ुदा के नाम से शुरू। | |
| 93 | 1 | क़सम है एक पहर चढ़े दिन की |
| 93 | 2 | और क़सम है रात की जब वह चीज़ों की पर्दापोशी करे (छुपा ले) |
| 93 | 3 | तुम्हारे परवरदिगार (पालने वाले) ने न तुमको छोड़ा है और न तुमसे नाराज़ हुआ है |
| 93 | 4 | और आखि़रत तुम्हारे लिए दुनिया से कहीं ज़्यादा बेहतर (ज़्यादा अच्छी) है |
| 93 | 5 | और अनक़रीब (बहुत जल्द) तुम्हारा परवरदिगार (पालने वाले) तुम्हें इस क़द्र अता कर देगा कि ख़ु़श हो जाओ |
| 93 | 6 | क्या उसने तुमको यतीम पाकर पनाह नहीं दी है |
| 93 | 7 | और क्या तुमको गुमगुश्ता (खोया हुआ) पाकर मंजि़ल (आखि़री जगह) तक नहीं पहुँचाया है |
| 93 | 8 | और तुमको तंगदस्त (माल के एतबार से ग़रीब) पाकर ग़नी (मालदार) नहीं बनाया है |
| 93 | 9 | लेहाज़ा (इसलिये) अब तुम यतीम पर क़हर न करना |
| 93 | 10 | और सायल (सवाल करने वाले) को झिड़क मत देना |
| 93 | 11 | और अपने परवरदिगार (पालने वाले) की नेअमतों को बराबर बयान करते रहना |
Sura-e-Al Lail 92nd surah of Quran Urdu Translation of Quran in Hindi (Allama zeeshan haider Jawadi sb.)
| सूरा-ए-अललैल | ||
| 92 | अज़ीम और दाएमी (हमेशा बाक़ी रहने वाली) रहमतों वाले ख़ुदा के नाम से शुरू। | |
| 92 | 1 | रात की क़सम जब वह दिन को ढाँप ले |
| 92 | 2 | और दिन की क़सम जब वह चमक जाये |
| 92 | 3 | और उसकी क़सम जिसने मर्द और औरत को पैदा किया है |
| 92 | 4 | बेशक तुम्हारी कोशिशें मुख़्तलिफ़ (अलग-अलग) कि़स्म की हैं |
| 92 | 5 | फिर जिसने माल अता किया और तक़्वा (ख़ुदा का ख़ौफ़) इखि़्तयार किया |
| 92 | 6 | और नेकी की तसदीक़ (गवाही) की |
| 92 | 7 | तो उसके लिए हम आसानी का इन्तिज़ाम कर देंगे |
| 92 | 8 | और जिसने बुख़्ल (कंजूसी) किया और लापरवाही बरती |
| 92 | 9 | और नेकी को झुठलाया है |
| 92 | 10 | उसके लिए सख़्ती की राह हमवार कर देंगे |
| 92 | 11 | और उसका माल कुछ काम न आयेगा जब वह हलाक (बरबाद, ख़त्म) हो जायेगा |
| 92 | 12 | बेशक हिदायत की जि़म्मेदारी हमारे ऊपर है |
| 92 | 13 | और दुनिया व आखि़रत का इखि़्तयार हमारे हाथों में है |
| 92 | 14 | तो हमने तुम्हें भड़की हुई आग से डराया |
| 92 | 15 | जिसमंे कोई न जायेगा सिवाए बदबख़्त शख़्स के |
| 92 | 16 | जिसने झुठलाया और मुँह फेर लिया |
| 92 | 17 | और उससे अनक़रीब (बहुत जल्द) साहेबे तक़्वा (ख़ुदा का ख़ौफ़ रखने वालों) को महफ़ूज़ रखा जायेगा |
| 92 | 18 | जो अपने माल को देकर पाकीज़गी का एहतेमाम करता है |
| 92 | 19 | जबकि उसके पास किसी का कोई एहसान नहीं है जिसकी जज़ा (सिला) दी जाये |
| 92 | 20 | सिवाए ये कि वह ख़ुदाए बुजु़र्ग की मजऱ्ी का तलबगार है |
| 92 | 21 | और अनक़रीब (बहुत जल्द) वह राज़ी हो जायेगा |
Sura-e-Shams 91st surah of Quran Urdu Translation of Quran in Hindi (Allama zeeshan haider Jawadi sb.)
| सूरा-ए-शम्स | ||
| 91 | अज़ीम और दाएमी (हमेशा बाक़ी रहने वाली) रहमतों वाले ख़ुदा के नाम से शुरू। | |
| 91 | 1 | आफ़ताब (सूरज) और उसकी रौशनी की क़सम |
| 91 | 2 | और चाँद की क़सम जब वह उसके पीछे चले |
| 91 | 3 | और दिन की क़सम जब वह रौशनी बख़्शे |
| 91 | 4 | और रात की क़सम जब वह उसे ढाँक ले |
| 91 | 5 | और आसमान की क़सम और जिसने उसे बनाया है |
| 91 | 6 | और ज़मीन की क़सम और जिसने उसे बिछाया है |
| 91 | 7 | और नफ़्स (जान) की क़सम और जिसने उसे दुरूस्त (ठीक) किया है |
| 91 | 8 | फिर बदी (बुराई) और तक़्वा (ख़ुदा के ख़ौफ़) की हिदायत दी है |
| 91 | 9 | बेशक वह कामयाब हो गया जिसने नफ़्स (जान) को पाकीज़ा बना लिया |
| 91 | 10 | और वह नामुराद हो गया जिसने उसे आलूदा कर दिया है |
| 91 | 11 | समूद ने अपनी सरकशी (बग़ावत) की बिना पर रसूल की तकज़ीब (झुठलाना) की |
| 91 | 12 | जब उनका बदबख़्त उठ खड़ा हुआ |
| 91 | 13 | तो ख़ुदा के रसूल ने कहा कि ख़ुदा की ऊँटनी और उसकी सेराबी (भूख-प्यास) का ख़्याल रखना |
| 91 | 14 | तो उन लोगों ने उसकी तकज़ीब (झुठलाना) की और उसकी कोंचे काट डालीं तो ख़ुदा ने उनके गुनाह के सबब उन पर अज़ाब नाजि़ल कर दिया और उन्हें बिल्कुल बराबर कर दिया |
| 91 | 15 | और उसे इसके अंजाम का कोई ख़ौफ़ (डर) नहीं है |
Sura-e-Balad 90th surah of Quran Urdu Translation of Quran in Hindi (Allama zeeshan haider Jawadi sb.)
| सूरा-ए-बलद | ||
| 90 | अज़ीम और दाएमी (हमेशा बाक़ी रहने वाली) रहमतों वाले ख़ुदा के नाम से शुरू। | |
| 90 | 1 | मैं उस शहर की क़सम खाता हूँ |
| 90 | 2 | तुम उसी शहर में तो रहते हो |
| 90 | 3 | तुम्हारे बाप आदम (अलैहिस्सलाम) और उनकी औलाद की क़सम |
| 90 | 4 | हमने इन्सान को मशक़्क़त में रहने वाला बनाया है |
| 90 | 5 | क्या उसका ख़्याल ये है कि उस पर कोई क़ाबू न पा सकेगा |
| 90 | 6 | कि वह कहता है कि मैंने बेतहाशा सर्फ़ किया है |
| 90 | 7 | क्या उसका ख़्याल है कि उसको किसी ने नहीं देखा है |
| 90 | 8 | या हमने उसके लिए दो आँखे नहीं क़रार दी हैं |
| 90 | 9 | और ज़बान और दो हांेठ भी |
| 90 | 10 | और हमने उसे दोनांे रास्तों की हिदायत दी है |
| 90 | 11 | फिर वह घाटी पर से क्यों नहीं गुज़रा |
| 90 | 12 | और तुम क्या जानो ये घाटी क्या है |
| 90 | 13 | किसी गर्दन का आज़ाद कराना |
| 90 | 14 | या भूख के दिन में खाना खिलाना |
| 90 | 15 | किसी क़राबतदार (क़रीबी रिश्तेदार) यतीम को |
| 90 | 16 | या ख़ाकसार मिसकीन (मोहताज) को |
| 90 | 17 | फिर वह उन लोगों में शामिल हो जाता जो ईमान लाये और उन्होंने सब्र और मरहमत की एक दूसरे को नसीहत (अच्छी बातों का बयान) की |
| 90 | 18 | यही लोग ख़ु़शनसीबी वाले हैं |
| 90 | 19 | और जिन लोगों ने हमारी आयात से इन्कार किया है वह बदबख़्ती वाले हैं |
| 90 | 20 | उन्हें आग में डालकर उसे हर तरफ़ से बन्द कर दिया जायेगा |
Sura-e-Fajra 89th surah of Quran Urdu Translation of Quran in Hindi (Allama zeeshan haider Jawadi sb.)
| सूरा-ए-फ़ज्र | ||
| 89 | अज़ीम और दाएमी (हमेशा बाक़ी रहने वाली) रहमतों वाले ख़ुदा के नाम से शुरू। | |
| 89 | 1 | क़सम है फ़ज्र की |
| 89 | 2 | और दस रातों की |
| 89 | 3 | और जुफ़्त व ताक़ की |
| 89 | 4 | और रात की जब वह जाने लगे |
| 89 | 5 | बेशक इन चीज़ों में क़सम है साहेबे अक़्ल के लिए |
| 89 | 6 | क्या तुमने नहीं देखा कि तुम्हारे रब ने क़ौमे आद के साथ क्या किया है |
| 89 | 7 | सुतून वाले इरम वाले |
| 89 | 8 | जिसका मिस्ल दूसरे शहरों में नहीं पैदा हुआ है |
| 89 | 9 | और समूद के साथ जो वादी में पत्थर तराश कर मकान बनाते थे |
| 89 | 10 | और मेख़ों वाले फि़रऔन के साथ |
| 89 | 11 | जिन लोगों ने शहरों में सरकशी (बग़ावत) फ़ैलायी |
| 89 | 12 | और खू़ब फ़साद (लड़ाई-झगड़ा) किया |
| 89 | 13 | तो फिर ख़ुदा ने उन पर अज़ाब के कोड़े बरसा दिये |
| 89 | 14 | बेशक तुम्हारा परवरदिगार (पालने वाला) ज़ालिमों की ताक में है |
| 89 | 15 | लेकिन इन्सान का हाल ये है कि जब ख़ुदा ने उसको इस तरह आज़माया कि इज़्ज़त और नेअमत दे दी तो कहने लगा कि मेरे रब ने मुझे बाइज़्ज़त बनाया है |
| 89 | 16 | और जब आज़माइश के लिए रोज़ी को तंग कर दिया तो कहने लगा कि मेरे परवरदिगार (पालने वाले) ने मेरी तौहीन की है |
| 89 | 17 | ऐसा हर्गिज़ नहीं है बल्कि तुम यतीमों का एहतराम नहीं करते हो |
| 89 | 18 | और लोगों को मिसकीनों (मोहताजों) के खाने पर आमादा नहीं करते हो |
| 89 | 19 | और मीरास के माल को इकठ्ठा करके हलाल व हराम सब खा जाते हो |
| 89 | 20 | और माले दुनिया को बहुत दोस्त रखते हो |
| 89 | 21 | याद रखो कि जब ज़मीन को रेज़ा-रेज़ा कर दिया जायेगा |
| 89 | 22 | और तुम्हारे परवरदिगार (पालने वाले) का हुक्म और फ़रिश्ते सफ़ दर सफ़ आ जायेंगे |
| 89 | 23 | और जहन्नम को उस दिन सामने लाया जायेगा तो इन्सान को होश आ जायेगा लेकिन उस दिन होश आने का क्या फ़ायदा |
| 89 | 24 | इन्सान कहेगा कि काश मैंने अपनी इस जि़न्दगी के लिए कुछ पहले भेज दिया होता |
| 89 | 25 | तो इस दिन ख़ुदा वैसा अज़ाब करेगा जो किसी ने न किया होगा |
| 89 | 26 | और न इस तरह किसी ने गिरफ़्तार किया होगा |
| 89 | 27 | ऐ नफ़्से मुतमईन (इत्मीनान वाले नफ़्स) |
| 89 | 28 | अपने रब की तरफ़ पलट आ इस आलम में कि तू उससे राज़ी है और वह तुझ से राज़ी है |
| 89 | 29 | फिर मेरे बन्दों में शामिल हो जा |
| 89 | 30 | और मेरी जन्नत में दाखि़ल हो जा |
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